विशेष

  • राजीव गांधी जयंती : पिता राजीव गांधी एक विनम्र, सज्जन और स्नेह करने वाले व्यक्ति थे जिनके जाने से मेरे जीवन में बड़ा शून्य पैदा हुआ : कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी।

    (राजेश कुमार, टाइम्स ख़बर)। कांग्रेस लीडर व पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की आज 74वीं जयंती है। इस मौके पर राजधानी दिल्ली समेत पूरे देश में अलग अलग जगहों पर उन्हें याद किया गया और श्रद्धांजलि दी गई। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। पत्नी सोनिया गांधी, बेटे राहुल गांधी के साथ बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा और दामाद रॉबर्ट वाड्रा ने भी राजीव गांधी को श्रद्धांजलि दी। राजीव का जन्म 20 अगस्त 1944 को हुआ था मुंबई में। राजीव गांधी आज होते तो लोकतंत्र की मजबूती के साथ साथ विकास की गति और मजबूत होती। लेकिन 1991 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में उनकी हत्या कर दी गई मानव बम के मार्फत। जबरदस्त विस्फोट किया गया। दिन था 21 मई। इस दिन देश ने एक लीडर खो दिया जो भारत के भविष्य को और मजबूती देता। पूर्व प्रधानमंत्री व अपने पिता को याद करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि राजीव गांधी एक विनम्र, सज्जन और स्नेह करने वाले व्यक्ति थे जिनके जाने से मेरे जीवन में बड़ा शून्य पैदा हुआ। मुझे वो समय याद आ रहा है जब हम साथ थे और हम सौभाग्यशाली थे कि उनके जीवित रहते हुए हमने उनके कई जन्मदिन साथ मनाए। उनकी कमी बहुत महसूस होती है लेकिन उनकी यादें जिंदा हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राजीव गांधी की जयंती पर उनके देश के हित में योगदान को याद किया। उन्होंने ट्वीट किया, 'हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि। हम देश के लिए किए गए उनके प्रयासों को याद करते हैं।' पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद और अशोक गहलोत ने वीर भूमि जाकर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की। राजीव गांधी को राजनीति बिल्कुल पंसद नहीं थी। वे इससे दूर ही रहते थे। देश के सबसे ताकतवर परिवार का यह युवा एक एयरलाइन में नौकरी कर अपने जीवन में खुश थे। ऐसे उन्हें धन-दौलत की कमी नहीं थी वे नौकरी अपनी खुशी से कर रहे थे। उनके छोटे भाई संजय गांधी की मौत 1980 में ही एक हवाई दुर्घटना में हो चुकी थी। ऐसे में अपनी मां की सहायता के लिये उन्हें राजनीति मे प्रवेश करना पड़ा। और वे 1982 में राजनीति में प्रवेश किये। और अमेठी से चुनाव जीतकर वे सांसद चुने गये। इस बीच 31 अक्टूबर 1984 को उनकी मां और देश के प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गई उनके हीं प्रधानमंत्री निवास 1 सफदर जंग रोड पर। हत्या उनके हीं सिख अंगरक्षक सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने की। इसके बाद राजीव गांधी को कांग्रेस पार्टी और देश की बागडोर संभालनी पड़ी। वे देश के प्रधानमंत्री बने। सबसे युवा प्रधानमंत्री थे देश के। और आगामी चुनाव में उन्हें भारी सफलता मिली और प्रधानमंत्री का दायित्व संभाले रखा। उनके कार्यकाल में दो सर्वाधिक चर्चित मुद्दे रहे। एक उनके विरोध में और दूसरा उनके पक्ष में। उनके कार्यकाल में बोफोर्स तोप का मुद्दा उठा। उनपर आरोप लगाया गया कि कमिशन का। इसको लेकर जमकर राजनीति हुई लेकिन आज तक कुछ भी साबित नहीं किया जा सका। कहा जाता है कि राजीव गांधी को चुनाव में हराने के लिये इस मुद्दे को उठाया गया था। और आगामी लोकसभा चुनाव हार गये। लेकिन उनके कार्यकाल में खरीदे गये बोपोर्स तोप ने देश की लाज रखी। जब कारगिल की ठंड में कोई हथियार काम नहीं कर रहे थे ठीक से, ऐसे में ही कड़ाके की ठंड में बोफोर्स की गर्जना से पाकिस्तान कांप चुका था। और पाकिस्तान को शिकस्त देने में बोफोर्स ने अहम भूमिका निभाई।

    Read more ...
  • पुण्यतिथि विशेष : आपके विचार सही, लक्ष्य ईमानदार हो तो सफलता निश्चित मिलती है - लोकमान्य तिलक

    - राजेश कुमार, टाइम्स ख़बर (timeskhabar.com) (जन्म 23 जुलाई 1856 - मृत्यु 1 अगस्त 1920) बाल गंगाधर तिलक (लोकमान्य तिलक) हमारे श्रेष्ठ नेतृ्त्व करने वाले स्वतंत्रतासेनानियों में से एक थे। वे श्रेष्ठ स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ विचारक और समाज सुधारक भी थे। इन्होंने अंग्रेजों के विरूद्ध खुलकर अपने विचार रखे। 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले स्थित चिखली गांव में इनका जन्म हुआ। इनके पिता गंगाधर पंत अध्यापक थे और दादाजी केशरावजी पेशवा राज्य में बड़े पद पर आसिन थे। लोकमान्य तिलक हर हाल में देश की आजादी चाहते थे। उन्होंने नारा दिया था कि "स्वराज यह मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर हीं रहूंगा।" यह नारा बहुत प्रसिद्ध हुआ था और क्रांतिकारियों की टोली में इस वाक्य ने वास्तव में क्रांति कर दी थी। इनका मानना था कि प्रार्थना से कभी भी आजादी नहीं मिलती। इन्होंने भारतीयों में एकता स्थापित करने के लिये मुंबई में गणपति पूजा और शिवाजी जयंती की शुरूआत की। ताकि लोग एक जगह इकठ्ठे हों और एक दूसरे के विचारों से अवगत होकर अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हों। अंग्रेज तिलक जी से इतने भयभीत रहते थे कि वे उन्हें भारतीय आशांति के पिता कहते थे तो देशवासी उन्हें सम्मान से 'लोकमान्य' कहते थे। वे देशवासियों के नायक थे। - 13 जुलाई 1856 को स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक का जन्म हुआ था। - 1871 में 15 वर्ष की आयु में उनका विवाह तापीबाई से हुआ। - 1873 में वे डेक्कन कॉलेज में दाखिला लिया। - 1876 में प्रथम श्रेणी से बीए पास हुए। कानून की परीक्षा भी पास की। - 1880 में राजनीति के क्षेत्र में कदम रखे। बलवन्त वासुदेव फडके की सहायता से विद्रोह का झण्डा फहराकर ब्रिटिश शासन के प्रति अपना विरोध प्रकट किया। - 1880 में पुणे में न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना की। - 1881 में पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश कर मराठा केसरी पत्रिका का संचालन किया । इसके माध्यम से जनजागरण व देशी रियासतों का पक्ष प्रस्तुत किया। - 1888-89 में शराबबन्दी, नशाबन्दी व भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाये। - 1890 में वे कांग्रेस पार्टी से जुड़े। - 1891 को सरकार द्वारा विवाह आयु का स्वीकृति विधेयक का बिल उन्होंने प्रस्तुत किया। - 1895 में इन्होंने कांग्रेस की नीतियों की आलोचना की। - 1907 में कांग्रेस पार्टी का विभाजन हो गया नरम दल और गरम दल में। तिलक गरम दल के थे। इनके साथ लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल शामिल थे। इन्हें लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाने लगा।

    Read more ...
  • कारगिल युद्ध : जमीन से पहाड की चोटियों पर पहुंच पाकिस्तानी सेना को धूल चटाया। गौरवशाली भारतीय सेना पर गर्व है देश को।

    (राजेश कुमार, ग्लोबल ख़बर)। आज ही के दिन यानी 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने पाकिस्तान की सेना को नेस्तनाबूद कर कारगिल में पुन: तिरंगा लहराया और अपनी धरती को पाकिस्तान की सेना और आतंकवादियों से मुक्त कराया। ये हम सभी के लिये गौरव का दिन है। हम भारतवासी अपने बहादुर सैनिको पर गर्व महसूस करते हुए आज के दिन को विजय दिवस के रूप में मनाते हैं। कारगिल युद्ध गवाह है कि किस प्रकार पाकिस्तान ने भारत के साथ गद्दारी की। और धोखे से हमारी जमीन पर कब्ज जमा लिया था। लेकिन देश के योद्धाओं ने बर्फीली तूफानों और पाकिस्तानी हमले का सामना करते हुए पाकिस्तानी सेनाओं का खात्मा किया। भारतीय सेना की विशेषता है कि यदि एक बार कदम आगे बढ गये तो बढ गये। वे रूकते नहीं चाहे सामने कोई भो हो। यह युद्ध आसान नहीं था। दुनियां की सबसे ऊंची चोटी पर भारतीय सेना ने युद्ध लडी। लगभग 18 हजार फीट ऊपर। जो दिक्कतों का सामना भारतीय सेना को करना पड़ा वह पाकिस्तानी सेना को नहीं क्योंकि पाकिस्तान की सेना और आतंकवादी धोखे से कारगिल की चोटियों पर पहुंच अपना ठिकाना बना चुके थे। युद्ध शुरू होने से कई महीने पहले ही पाकिस्तान सेना और आतंकियों ने पहाड की चोटियों पर गोला-बारूद लेकर पोजिशन ले चुके थे। यानी भारतीय इलाके पर कब्जा कर लिया था। भारत की ओर से अपनी जमीन को छुड़ाने के ऐलान के बाद भारतीय सेना को जमीन-तल से चोटियों पर पहुंचना था। ठंड इतनी की रूह कांप जाये। फिर भी भारतीय योद्धाओं ने हिम्मत नहीं हारी और पाकिस्तानी सेना को करारी हार का सामना करना पड़ा।

    Read more ...
  • अमेरिका और नाटो संबंध, अस्तित्व को लेकर सवाल : वरिष्ठ पत्रकार राजेश कुमार।

    (राजेश कुमार, संपादक, टाइम्स खबर) ब्रिटेन की यात्रा पर गये अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिलहाल उन अटकलों पर विराम लगा दिया है कि अमेरिका नाटों से बाहर होगा। उन्होंने कहा कि ऐसा मैं कर सकता हूं लेकिन मुझे नहीं लगता है कि यह जरूरी है। नाटो इन दिनों सुर्खियों में है क्योंकि इसके सबसे ताकतवर देश अमेरिका ने इससे अलग होने की धमकी दी है। बताया जा रहा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ने नेटो को धमकी दी है कि यदि सदस्य देश अपने सकल घरेलू उत्पाद के दो प्रतिशत रक्षा के लिये नहीं देते हैं तो वह नेटो से बाहर आ जायेगा। राट्रपति ट्रंप ने सदस्य देशों को पत्र लिखकर याद दिलाया था कि वे धीरे धीरे रक्षा बजट बढायेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वे भूल रहे हैं। ट्रंप ने यह भी कहा कि नेटो के सदस्य देश अमेरिका का फायदा उठा रहे हैं। अमेरिका के इस रूख से नेटो के भविष्य पर सवाल उठ खडा हुआ है। प्रतिद्धन्दी रूस ने नेटो को बेकार का गठबंधन कहा है। आईये जानते हैं कि नाटो क्या है? 1. नाटो (नॉर्थ एटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) यानी उत्तरी एटलांटिक संधि संगठन की स्थापना 4 अप्रैल 1949 को हुआ था वाशिंगटन में। यह एक सैन्य संगठन है और इसका मुख्यालय बेल्जियम (ब्रुसेल्स) में है। 2. इस गठबंधन में अमेरिका और ब्रिटेन समेत कुल 29 देश हैं। इनके बीच सैन्य और राजनीतिक साझेदारी है। इनमें से किसी भी एक देश पर हमला होता है तो नाटो के सभी सदस्य उनकी मदद करेंगे। 3. वर्तमान में नाटो के कुल 29 सदस्य हैं। इनमें से 12 सदस्य संस्थापक है। ये हैं - अमेरिका कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, नीदरलैंडस, बेल्जियम, पुर्तगाल, डेनमार्क, आइसलैंड तथा लक्जमबर्ग। इनके अलावा ग्रीस, तुर्की, जर्मनी, स्पेन, चेक गणराजय, हंगरी, पोलैंड, बुल्गारिया, एस्टोनिया, लाटविया, लिथुआनिया, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, अल्बानिया एवं क्रोएशिया तथा मोंटेनेग्रो इसके सदस्य हैं। मोंटेनेग्रो 29वां सदस्य है। 4. उपलब्ध जानकारी के अनुसार नाटो का संयुक्त सैन्य खर्च दुनिया के रक्षा खर्च का लगभग 70 प्रतिशत है। इनमें अमेरिका अकेला आधा खर्च वहन करता है और ब्रिटेन, फ्रांस, इ़टली और जर्मनी मिलकर 15 प्रतिशत खर्च उठाते हैं। दरअसल द्धितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व में दो शक्तियों का उदय हुआ - सोवियत संघ और अमेरिका। पश्चिमी देशों का कहना है कि द्धितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप से अपनी सेनाएं हटाने से इंकार कर दिया औ वहां साम्यवादी शासन की स्थापना की कोशिश की। इसी का लाभ उठाकर अमेरिका ने साम्यवादी विरोधी नारा दिया और एक सैन्य संगठन बनाने के सुझाव दिया जो आपस में मिलकर एक साथ दुश्मन का सामना करेंगे। विश्वयुद्द के दौरान पश्चिमी युरोपीय देशों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा था। अत: उनके आर्थिक विकास के लिये उन्हें अमेरिका से बड़ी उम्मीदें थी। ऐसे में अमेरिका का प्रस्ताव आया और यूरोपीय देशों ने उसका समर्थन कर दिया। अब नाटो की स्थापना के साथ ही पूरे विश्व में खासकर यूरोप में अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच कोल्डवार शुरू हो गया।

    Read more ...
  • WTO का अस्तित्व खतरे में?

    (राजेश कुमार) विश्व स्तर पर व्यापार के लिये नियम बनाने वाले संगठन डब्ल्यूटीओ (वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन) यानी विश्व व्यापार संगठन का अस्तित्व अब खतरे में है। सभी देशों को मुश्किलों का सामना करना पडेगा। भारत बाइलेटरल व्यापार समझौते की कोशिश में है। दरअसल अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डब्ल्यूटीओ की कड़ी आलोचना की और कहा ऑर्गेनाइजेशन का व्यवहार अमेरिका के साथ बहुत बुरा रहा। विश्व व्यापार संस्था अमेरिका के साथ भेदभाव करती है। इसके लिये वे अपने पूर्व के राष्ट्रपतियों के नीतियों को जिम्मेवार मानते हैं। यह अमेरिका के लिेये अनुचित स्थिति है। उन्होंने कहा कि जब से चीन ने इसकी सदस्यता ली है तब से उसे ही इसका फायदा पहुंचा है। ट्रंप ने साफ किया है कि वे डब्ल्यूटीओ से बाहर नहीं जा रहे लेकिन वे अपने व्यापार को ठीक करेंगे। उन्होंने कहा कि अमेरिकी व्यापार घाटे में है। यूरोपीय संघ के साथ 150 अरब डॉलर, मैक्सिको के साथ 100 अरब डॉलर और चीन के साथ 375 अरब डॉलर का नुकसान है। कनाडा के साथ भी व्यापार ठीक नहीं लेकिन यह सब कुछ ठीक कर लिया जायेगा।

    Read more ...
  • आत्मरक्षा, शांति, समृद्धि और विकास का प्रतीक है राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा।

    (राजेश कुमार, ग्लोबल खबर)। राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा का विशेष सम्मान है। धर्म-जाति-भाषा आदि मसलों को लेकर देश के अंदर कितने भी मतभेद हों लेकिन जब राष्ट्र पर कोई संकट आता है तो सभी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंग की छत्रछाया में एक हो जाते हैं। लौह पुरूष के नाम विश्व चर्चित सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भी कहा था कि देश की मिट्टी में कुछ अनूठा है, जो कई बाधाओं के बावजूद हमेशा महान आत्माओं का निवाश रहा है। राष्ट्रीय ध्वज की अभिकल्पना आंध्र प्रदेश के रहने वाले कृषि वैज्ञानिक व स्वतंत्रा सेनानी पिंगली वैंकेया ने की थी। और इसे संविधान सभा ने अपनाया था 22 जुलाई 1947 को। आईये जानते हैं अपने राष्ट्रीय ध्वज के बारे में। - राष्ट्रीय ध्वज में तीन समान चौड़ाई के क्षैतिज पट्टियां हैं - सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद और सबसे नीचे हरे रंग की पट्टी है। - ध्वज की लंबाई एवं चौड़ाई का अनुपात 3:2 है। सफेद रंग के पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है जिसमें 24 आरे (तीलियों) हैं। - चक्र का व्यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है। इसे सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ से लिया गया है।

    Read more ...
  • भारत-चीन के व्यापारिक संबंध में प्रधानमंत्री को समझना होगा कि चीन भारत के लेकर क्या रूख अपनाता है - कांग्रेस लीडर व पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिस सिब्बल।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच चीन के शहर वुहान में हुए अनौपचारिक शिखर सम्मेलन को, वैश्विक समीकरणों को बदलने के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। चीन अपने व्यापार और आर्थिक संघर्ष के साथ अमेरिकी सर्वोच्चता को चुनौती देने इच्छा रखता है। हाल के वर्षों में, चीन में कमजोर वृद्धि हुई है। इसकी वन-बेल्ट वन-रोड (ओबीओआर) पहल का शुभारंभ न केवल विकास को बढ़ावा देने बल्कि हमारे पड़ोसियों को प्रभावित करने का प्रयास है। इसने बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका की अर्थव्यवस्थाओं में $ 150 बिलियन से अधिक का निवेश किया है और इसके प्रति प्रतबिद्ध है। पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में चीनी परियोजना के साथ-साथ चीनी के असली इरादे से प्रतीकात्मक रूप से भारत को घेरना है। दूसरी तरफ, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के तहत वैश्वीकरण को झटका दिया है। व्यापार मोर्चे पर, ट्रम्प चीन के 200 अरब डॉलर से अधिक व्यापार अधिशेष को कम करने के लिए टैरिफ बाधाओं को बनाने की कोशिश करता है। ट्रम्प चीनी बाजारों तक पहुंच चाहता है और रक्षा लागतों को साझा करने के लिए नाटो सहयोगियों को मनाने की कोशिश करता है। रूस से निपटने और ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकलने वाले लोगों के खिलाफ उनकी मंजूरी भारत और वैश्विक व्यापार के लिए प्रभाव डालेगी।

    Read more ...
  • वैश्विक तनाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी रूस पहुंचे। अमेरिका और रूस के बीच संतुलन कायम रखने की चुनौती।

    (राजेश कुमार, टाइम्स खबर) देश में यानी घर के अंदर घरेलू झगडे कितने भी हो लेकिन विश्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम स्थापित हो चुका है। इतने अनुभव प्राप्त कर चुके हैं कि इसका लाभ देश को सदैव मिलता रहेगा। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज रूस के सोचि पहुंच गये हैं। उनकी मुलाकात रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से होगा। राष्ट्रपति पुतिन बीते महीने एक बार फिर रूस के राष्ट्रपति चुने गये हैं छह सालों के लिये। राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रूस आने का न्यौता दिया जिसे प्रधानमंत्री ने स्वीकार कर लिया। दोनो देशों के प्रमुखों की यह मुलाकात अनौपचारिक होगी। यानी पहले से कोई ऐजेंडा तय नहीं है। ऐसा ही दौरा प्रधानमंत्री मोदी चीन का कर चुके है। 30 अप्रैल को वुहान शहर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री मोदी के बीच वार्तालाप हुई आनौपचारिक तौर पर। चीन और रूस का दौरा अनौचारिक भले हीं हो लेकिन इसका खासा महत्व है विश्व कुटनीति और सामरिक दुनिया में। इस मह्तव को प्रधानमंत्री मोदी के इस ट्वीट से समझा जा सकता है। उन्होंने बीते रविवार यानी रूस जाने से पहले उन्होंने ट्वीट किया कि हमें पूरा भरोसा है कि राष्ट्रपति पुतिन से बातचीत के बाद भारत और रूस की खास रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होगी।

    Read more ...
  • कर्नाटक विस चुनाव : धर्म का महत्व, पर भारी है जातीय गणित कर्नाटक की राजनीति में

    (राजेश कुमार, ग्लोबल ख़बर)। उत्तर भारत की तरह दक्षिण भारत की राजनीति का तानाबाना भी जातियों के इर्द-गिर्द ही बुना जाता है। यहां जातियों के हिसाब से राजनीति का मूल्यांकन करें तो सबसे पहले लिंगायत, वोक्कालिगा, कुरूबा, एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों के जनसंख्या को राजनीति के हिसाब से समझना जरूरी होगा। लिंगायत - इस बार के चुनाव में लिंगायत समुदाय का विशेष महत्व है। यह पहले एक पंथ के रूप में जाना जाता था बाद में इसे अगड़ी जाति के रूप में जाना जाने लगा। लिंगायत समुदाय के धर्मगुरू काफी समय सनातन धर्म से अलग धर्म की मान्यता देने की मांग करते रहे जिस पर कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने मुहर लगा दी। लेकिन केंद्र की बीजेपी सरकार ने इस पर कुछ नहीं किया है अभी तक। अंतिम मुहर केंद्र सरकार को ही लगानी है। इसे लिंगायत अपने खिलाफ मान रहे हैं। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी और बीजेपी अध्यक्ष दोनो ने हीं लिंगायत समुदाय से जुडे मठ धर्मगुरूओं से मुलाकात की। लिंगायत समुदाय ने बीजेपी के वजाय कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान किया है। इनकी आबादी लगभग 17-18 प्रतिशत है। अब देखना है कि लिंगायत समुदाय की ओर से कितना प्रतिशत वोट बीजेपी को जाता है। बीजेपी ने पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है जो लिंगायत समुदाय से हैं। कर्नाटक में जब पहली बार बीजेपी की सरकार बनी थी तो येदुरप्पा की बड़ी भूमिका थी। लिंगायत समुदाय ने बीजेपी को वोट किया और सरकार बनी। विवाद होने के बाद येदुरप्पा अलग हो गये और अगली विधान सभा चुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा। इस बार की स्थिति थोडी दिक्कत वाली है। बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार येदुरप्पा हैं जो लिंगायत हैं। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने अलग धर्म की मान्यता देने के मामले में लिंगायत समुदाय की मांग को पूरा किया है इसलिये लिंगायत समुदाय ने कांग्रेस के पक्ष में वोट करने का ऐलान किया। यह बीजेपी के लिये झटका है वास्तव में चुनाव के बाद ही मालूम चल पायेगा। लिंगायत समुदाय के बडे नेता थे रामकृष्ण हेंगड़े। इसके बाद बने येदुरप्पा। लेकिन लिंगायत समुदाय ने अलग धर्म की मांग पूरी करने के लिये कांग्रेस के साथ खडी दिख रही है। लिंगायत में जो वीरेशैवा पंथ है वह लिंगायत से सहमत नहीं दिख रहे। इसकी संख्या चार प्रतिशत के आसपास है जो बीजेपी के साथ दिख रही है। यानी 13-14 प्रतिशत लिंगायत कांग्रेस के साथ है।

    Read more ...
  • कर्नाटक विस चुनाव : लिंगायत का राजनीतिक महत्व। अलग धर्म की मांग। कांग्रेस ने समर्थन दिया। बीजेपी का विरोध। जानते हैं कौन हैं लिंगायत।

    (राजेश कुमार, टाइम्स ख़बर) कर्नाटक में लिंगायत समुदाय का विशेष महत्व है। इनकी संख्या भी अच्छी खासी है। लगभग 17 प्रतिशत, इसलिये इनका चुनावी महत्व भी ज्यादा है। इस समुदाय का मानना है कि वे लोग हिन्दू (सनातन धर्म) नहीं है।पूजा पाठ करने का तरीका भी बिल्कुल अलग है। वे निराकार शिव की आराधना करते हैं। कोई मूर्ति पूजा नहीं होती। और न ही वे मंदिर जाते हैं। इसलिये लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा दिया जाये। ये मांग काफी अरसे से हो रही है। इसको लेकर राज्य में हिंसा भी हो चुकी है। इस बीच कर्नाटक विधान सभा चुनाव से पहले कर्नाटक सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता देने की सिफारिश कर दी। बीजेपी ने इसका विरोध किया। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लिंगायत समुदाय के धर्म-गुरूओं से मुलाकात की लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। लिंगायत समुदाय ने कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। लिंगायत में भी मतभेद है। एक अलग धड़ा है वीरशैवा पंथ जो अपने आपको हिंदू धर्म से अलग नहीं मानता। - विधान सभा चुनाव से पहले कांग्रेस की सरकार ने लिंगायत समुदाय की काफी पुरानी मांगों को पूरा करते हुए लिंगायत को अलग धर्म के रूप में मान्यता देने की सिफारिश की। - लिंगायत अपने आपको हिंदू से अलग मानते हैं। वे मूर्तिपूजा नहीं करते। शिव को निराकार मानते हैं। मंदिर नहीं जाते। - लिंगायतो में ही एक अलग पंथ है वीरेशैवा। यह अपने को हिंदू से अलग नहीं मानते। शिवपूजा भी करते हैं। इतना ही नहीं गले में लिंग धारण भी करते हैं।

    Read more ...
  •     
City4Net
Political