विचार मंच

  • अयोध्या भूमि पूजन के मूहुर्त का मामला यह ‘हिन्दू बनाम हिन्दू’ के लंबे विवाद का कारण बन सकता है : वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद

    अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए हो रहे भूमिपूजन को लेकर जो विवाद हो रहा है, उसे टाला जाना चाहिए था। यह एक ऐसा विवाद है, जो मंदिर के निर्माण के दौरान ही नहीं, बल्कि उसके बाद भी लोगों के दिलोदिमाग को मथता रहेगा। मुख्य विवाद है कि शंकराचार्य, ज्योतिष और अन्य मंदिर निर्माण से जुड़े अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि भूमिपूजन का समय अशुभ है। वे कह रहे हैं कि भादों के महीने में किसी नये निर्माण के लिए भूमिपूजन नहीं होते। राममंदिर एक वैष्णव मंदिर है। राम को विष्णु का अवतार माना जाता है। अनेक वैष्णवार्चाय भी इस मंदिर के लिए भूमिपूजन के समय पर आपत्ति प्रकट कर रहे हैं। उनकी आपत्ति को दरकिनार किया जाना उचित नहीं है, क्योंकि आपत्ति करने वाले अनेक लोग तो ऐसे हैं जिनका राजनीति से कुछ लेना देना नहीं और उनमें से जिनका राजनीति से लेना देना है, उनमें से ज्यादा तो आरएसएस के हिन्दुत्व ब्रांड की राजनीति का समर्थन ही करने वाले है।

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  • चीन की वजह से खुशहाल रिश्तों में दरार। रूस ने चीन के साथ एस-400 करार को निलंबित किया।यदि चीन पाक को यह हथियार दे देता तो भारत के लिये मुश्किलें हो सकती थी : वरिष्ठ पत्रकार राजेश कुमार

    विस्तारवादी मानसिकता वाला देश है चीन। भारत समेत तमाम सीमावर्ती देशों की जमीनें हड़पने की कोशिश करने वाला देश चीन अब खुद हीं अपने जाल में फंसता जा रहा है। कहा भी जाता है कि जब कोई व्यक्ति दूसरों के लिये गढ्ढा खनता है तब प्रकृति उसके लिये खाई तैयार कर देती है। यहीं होता जा रहा है कि चीन के साथ। अमेरिका से दुश्मनी करने वाला चीन ने अब अपने दो ताकतवर पड़ौसी देशों भारत और रूस से भी दुश्मनी मोल लिया है। भारत पर धोखे से हमले करने के बाद दोनो देश इन दिनों युद्ध की स्थिति में है। वहीं रूस ने भी चीन को भारी झटका दिया है।

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  • नई वैश्विक व्यवस्था : खतरनाक साजिश है एजेंडा-21 - वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण कुमार

    कुछ साल पहले एक फिल्म आने वाली थी जिसका नाम था ए ग्रे स्टेट (A Grey State)। इस फिल्म के माध्यम से आज कोरोना महामारी की आड़ में जो कुछ भी हो रहा है वह फिल्मकार ने बताने की कोशिश की थी, लेकिन दुर्भाग्य से फिल्म के रिलीज होने से पहले ही फिल्म के निर्माता-निर्देशक डेविड क्रौली की हत्या हो गई।

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  • Bihar-Election बिहार विधानसभा चुनाव इसे टालने में ही समझदारी है : वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद

    बिहार विधानसभा ( Bihar Vidhansabha) का वर्तमान कार्यकाल समाप्ति की ओर है और नवंबर महीने तक नई विधानसभा के लिए चुनाव हो जाना चाहिए। चुनाव की वहां सरगर्मी भी शुरू है। लेकिन इसी सरगर्मी के बीच वहां कोरोना के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं। यदि दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से उनकी तुलना करें, तो वहां अभी भी कोरोना के मामले कम दिख रहे हैं। जाहिर है, कोरोना मामले अभी पीक की और बढ़ ही रहे हैं। प्रतिदिन कोरोना संक्रमण के मामले में 19 जुलाई को तो इसने दिल्ली को भी पीछे छोड़ दिया है। पटना में राजनिवास, मुख्यमंत्री निवास, सचिवालय, भाजपा कार्यालय जैसी जगहों में भी कोरोना पोजिटिव पाए गए हैं। जाहिर है, वहां चुनाव के लिए सही माहौल नहीं है। अभी तो वहां कोविड का प्रकोप कम है। समय के साथ यह बढ़ता जा रहा है। स्वास्थ्य का वहां ढांचा बहुत कमजोर है। वह इतना कमजोर है कि हम उसे लगभग अनुपस्थित मान सकते हैं। इसके कारण जो बीमार हैं, उनका सही इलाज नहीं हो पा रहा है। एक मामला तो ऐसा आया कि जो डॉक्टर कोरोना का इलाज कर रहा था और इलाज करते हुए जब खुद संक्रमित हो गया, तो उसको किसी अस्पताल में भर्ती होने के लिए बेड ही नहीं मिल रहा था। चर्चा है कि कोविड अस्पतालों में राजनीतिज्ञ और उनके रिश्तेदार भरे हुए हैं और खुद बीमार डॉक्टरों के लिए बेड का अभाव हो गया है। यह भी खबर आई है कि अनेक अस्पताल ही वहां बंद कर दिए गए हैं, क्योंकि अस्पताल में जरूरी स्टाफ नहीं हैं।

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  • बेढब दौर के जनद्रोहियों की दास्तान : वरिष्ठ पत्रकार पंकज शर्मा

    सवाल कांग्रेस का नहीं है, सवाल भारतीय जनता पार्टी का नहीं है, सवाल सचिन पायलट का नहीं है और सवाल अशोक गहलोत का भी नहीं है। सवाल यह है कि यह हो क्या रहा है, सवाल यह है कि यह हो क्यों रहा है, सवाल यह है कि यह हो कैसे रहा है और सवाल यह है कि यह हो किस के लिए रहा है? राजस्थान की सरकार जाए-न-जाए, वहां भाजपा की सरकार बने-न-बने, सचिन पायलट अपना क्षेत्रीय दल बनाएं-न-बनाएं और वसुंधरा राजे छिटक कर भाजपा से बाहर गिरे-न-गिरें; मगर जनतंत्र की जो फ़ज़ीहत होनी थी, हो गई है, हो रही है और आगे और होगी। असली चिंता की बात यह है कि किसी को इसकी चिंता नहीं है। इस पूरी सियासी दुर्घटना का सब से गहरा कलंक सचिन पायलट के माथे पर है। वे एक बेतरह बेताब, बेसब्र, बेहूदे और बेढब खलनायक के तौर पर सामने आए हैं। 42 बरस की उम्र में 16 साल से लगातार गुदगुदे सिंहासन पर बैठने का सुख भी अगर किसी के विचारों और कार्यशैली में स्थिरता न ला सके तो उसकी कामनाओं को हवस न कहें तो क्या कहें? मेरे जैसे जो लोग सचिन के पिता राजेश पायलट को ज़रा नज़दीक से जानते रहे हैं, उन्हें ‘पूत कपूत तो का धन संचय’ की कहावत याद आ रही है। राजेश पायलट ने कांग्रेस के भीतर तत्कालीन नेतृत्व के सामने जिस-जिस तरह के मोर्चे लिए, उसका तो बित्ता भर भी अनुगमन करना सचिन के बूते का नहीं है। मगर सीनियर-पायलट ने कभी सांगठनिक परंपराओं और मर्यादा की दहलीज़ नहीं लांघी थी। जूनियर-पायलट ने अपने पिता के सारे संचित पुण्य-धन को पलीता लगा दिया

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  • सचिन पायलट के पास सीमित विकल्प कांग्रेस में बने रहना ही उनके लिए बेहतर होग : वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद

    सचिन पायलट अषोक गहलौत की सरकार को तो संकट में डाल नहीं सके, अब खुद वे राजनैतिक संकट का सामना कर रहे हैं। वे कुछ दिन पहले राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष थे। अब वे उस पद से हटा दिए गए हैं। वे प्रदेश की सरकार में उपमुख्यमंत्री थे। वहां से भी हटा दिए गए हैं। फिलहाल वे कांग्रेस से विधायक हैं और टोंक विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी विधायकी पर भी अब खतरा मंडरा रहा है। उनके साथ 18 अन्य कांग्रेस विधायकों की विधायकी भी खतरे में पड़ गई है। इस परिस्थिति में सचिन पायलट के पास अब बहुत ही सीमित विकल्प रह गए हैं। वे फिलहाल न्यायपालिका की शरण में हैं और राजस्थान विधानसभा के स्पीकर द्वारा दल बदल विरोधी कानून के तहत जारी किए गए नोटिस को कानूनी चुनौती दे रहे हैं। दलबदल विरोधी कानून के तहत सदस्यता समाप्त किए जाने के दो प्रावधान हैं। पहला प्रावधान तो यह है कि यदि खुलकर कोई यह कह दे कि जिस पार्टी के चुनाव चिन्ह पर वह विधायक बना है, उस पार्टी को उसने छोड़ दिया है और इसकी सूचना स्पीकर को भी दे दे, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी। यही कारण है कि पार्टी छोड़ने वाले विधायक या संसद अपनी विधायकी और सांसदी से इस्तीफा भी पार्टी छोड़ने के साथ साथ दे देते हैं, ताकि स्पीकर को उन्हें नोटिस जारी करने की जहमत नहीं उठानी पड़े।

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  • राजस्थान का पायलट गेम विधानसभा का विश्वास हासिल करें अशोक गहलौत : वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद

    राजस्थान में वही हो रहा है, जिसकी आशंका थी। मध्यप्रदेश की तरह वहां भी भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस सरकार को अपदस्थ कर सत्ता प्राप्ति की कोशिश कर रही है और इस कोशिश में उसका साथ दे रहे हैं सचिन पायलट। पिछले विधानसभा चुनाव के समय पायलट प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष थे और चुनाव जीतने के बाद वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी बन गए थे। उनको और उनके समर्थकों को लगता था कि उनके कारण ही कांग्रेस की राजस्थान में जीत हुई है, हालांकि वह जीत कोई बहुत बड़ी जीत नहीं थी। कांग्रेस को बहुमत के आंकड़े के पास ही सीटें मिली थीं और बसपा व कुछ अन्य छोटे दलों और निर्दलीयों की सहायता से उसकी सरकार बन गई, पर पायलट मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। कांग्रेस के दिग्गज नेता अशोक गहलौत मुख्यमंत्री बने और सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री बना दिया गया। उसके अलावा वे प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष भी बने रहे। लेकिन मुख्यमंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षा हिलोरें मार रही थीं। मध्यप्रदेश में उनके मित्र ज्योतिरादित्य के भाजपा में जाने के बाद उनके भी भाजपा में जाने की खबरें उड़ने लगी थी। लेकिन कोरोना संकट ने इंतजार को लंबा खीच दिया। पायलट देखना चाह रहे थे कि सिंधिया के साथ भाजपा में कैसा व्यवहार होता है। इधर सिंधिया राज्यसभा के सांसद बने और उनके समर्थक विधायको में से 12 मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री भी बन गए। भाजपा के नेतृत्व ने शिवराज सिंह चैहान के ऊपर सिंधिया को वरीयता दी। ऐसा करके पायलट को संदेश दिया गया कि उनसे जो भी वायदा किया जाएगा, उसे भाजपा पूरा करेगी।

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  • सवाल क्रीमी लेयर का, ओबीसी के बीच सर्वे करवाए सरकार : वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद

    ओबीसी के क्रीमी लेयर को लेकर सरकार एक बड़ी घोषणा करने जा रही है। क्रीमी लेयर की आर्थिक सीमा प्रति वर्ष 8 लाख रुपये सालाना आय से बढ़ाकर 12 लाख रुपये होने जा रही है। इस तरह की वृद्धि समय समय पर होती रही है। जब ओबीसी के आरक्षण को केन्द्र सरकार ने लागू किया था, तो यह सीमा एक लाख रुपये थी। यह 1993 की बात है। उसके 27 साल हो चुके हैं और इस बीच रुपये का भारी अवमूल्यन हुआ है। इसलिए 12 लाख की सालाना आय यदि सरकार कर देती है, तो उसमें कुछ भी गलत नहीं होगा। लेकिन इसके साथ साथ एक और बदलाव करने की सरकार की योजना है और उसके कारण विवाद हो सकता है। सच तो यह है कि यह विवाद शुरू भी हो गया है।

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  • चीनी संकट और हम, प्रधानमंत्री मोदी से गलती कहां हुई? : वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद ।

    - उपेन्द्र प्रसाद कोरोना संकट के बीच चीन ने भी भारत के लिए एक बड़ा सकट खड़ा कर दिया है और यह संकट 1962 के पहले वाले संकट से भी बड़ा है। हमारे 20 जबान शहीद हो चुके हैं। चीनी गिरफ्त में गए अपने 10 जवानों को जिंदा वापस पाने में हम सफल हुए हैं, लेकिन संकट समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा। मीडिया में स्टोरी प्लांट कर कभी चीनी सैनिकों के हताहत होने की भी बात की जाती है और कभी बात की जाती है कि चीनी सैनिक पीछे हट गए हैं। लेकिन उसके बाद खबर आती है कि चीन ने अन्य जगहों पर भी सेना तैनात कर रखी है और वह युद्ध की तैयारी कर रहा है। उधर चीन से कभी समझौतावादी स्वर उभरते हैं, तो कभी उधर से धमकी भरी बातें सुनने को मिलती हैं। भारत सरकार के एक स्वर नहीं : इस संकट के बीच सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि भारत सरकार एक स्वर में नहीं बोल रही है। सरकार की ओर से कभी कहा जाता है कि हमारे सैनिकों को धोखे से मारा गया। इसका मतलब यह है कि हमारी सेना को यह अंदाज नहीं था कि उनपर हमला हो सकता है और एकाएक धोखे से हुए हमले में वे शहीद गए। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमारे सैनिक मारते मारते मरे। विदेश मंत्रालय चीन के भारतीय क्षेत्र में धुस आने की बात करता है, तो प्रधानमंत्री कहते हैं कि चीन ने भारत में एक इंच की घुसपैठ कभी नहीं की और वह अभी भी भारतीय क्षेत्र के एक इंच पर काबिज नहीं है। विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री के बयानों में इस विरोधाभाष को ढकने की कोशिश में प्रधानमंत्री कार्यालय एक ऐसी सफाई दे डालता है, जिससे पूरा प्रकरण ही मजाक बन जाता है।

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  • चीन को झटका देते हुए रूस ने भारत को एस-400 देने का निर्णय लिया। और संकेत दिया कि भारत-चीन दोनो दोस्त हैं लेकिन प्राथमिकता भारत है - वरिष्ठ पत्रकार राजेश कुमार।

    - राजेश कुमार रूस की विजयी दिवस पर आयोजित भव्य पैरेड समारोह में भारतीय सैनिकों ने भी हिस्सा लिया। इस समारोह में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी शामिल हुए। यह समारोह कई मायने में महत्वपूर्ण है। साथ हीं एक बार फिर भारत और रूस की दोस्ती ने अपने विरोधियों को करारा जवाब दिया है। रूस ने इस संकट की घड़ी में चीन के विरोध को दरकिनार करते हुए साफ कर दिया कि रूस भारत को एडवांस एस-400 समय से पहले दे देगा। भारत और रूस को लेकर भारत में और देश के बाहर भी दो सवाल हमेशा से किये जाते रहे हैं पहला, रूस को भारत से लाभ हैं इसलिये वे साथ हैं और दूसरा जब भी चीन से भारत का मुकाबला होगा तब रूस चीन केसाथ होगा भारत के साथ नहीं। लेकिन आज की तारीख में भारत-रूस की दोस्ती के विरोधी चुप हैं। उनके मुंह पर ताला जड़ गया है। जो मीडिया रूस लीडर के अपेक्षा दूसरे अन्य विदेशी लीडर को अधिक तरजीह देते थे वे आज इस दोस्ती का गुनगान कर रहे हैं।

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