विचार मंच

  • न्याय की गुणवत्ता : न्यायमूर्ति गोगोई सही है। कार्यकारी के साथ न्यायपालिका-संघ लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा - कांग्रेस लीडर व प्रतिष्ठित एडवोकेट कपिल सिब्बल।

    एक स्वतंत्र निडर न्यायपालिका‘लीटमोटीफ’है जो संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करती है। इसके बिना, संविधान सिर्फ एक मृत पत्र के समान होगा, जैसे एक शरीर बिना आत्म के। कानून के अनुसार न्याय वितरण में, अदालत ने कार्यकारी अधिकारियों को नीतियां दी जो एक प्रकार से विधायिका पर प्रहार है। नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा में इसकी सतर्कता और सक्रिय भूमिका उन लोगों को चेतावनी है जो हमारे संविधान के मूल्यों को कम करना चाहते हैं। इस तरह के सतर्कता के बिना, देश अपनी लोकतांत्रिक जीवनशैली खो देगा। इसलिए न्यायाधीशों के लिए उत्साहपूर्वक अदालत की स्वतंत्रता और अखंडता की रक्षा करने के लिए न केवल हमारे लिए बल्कि सभी के लिए, इसे बिना किसी सुरक्षा के लिए लागू किया गया है। न्यायाधीश को यह समझना होगा कि वह अपनी दृष्टि और भारतीय लोकतंत्र की स्थिति की समझ, दोनों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करे। क्योंकि हमारा देश आज चुनौतियों से जूझ रहा है। ये सायरन आवाज आने वाले वर्षों तक हमारे कानों में गूंजेगी।

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  • बुराड़ी कांड के पीछे क्या था? लगे रहो मुन्ना भाई’के केमिकल लोचे ने फंदे पर लटकाया - वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद।

    (नवभारत टाइम्स के पूर्व रेजिडेंट संपादक उपेन्द्र प्रसाद)दिल्ली की बुराड़ी में 11 लोगों की मौत की गुत्थी लगभग पूरी तरह सुलझ गईहै। लोगों को दहलाने वाली इस घटना ने राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीयख्याति पा ली। एक साथ एक संयुक्त परिवार के सभी 11 सदस्यों का फांसी परलटक कर मर जाना अपने आप में एक दहशत भर देने वाली घटना थी। इस तरह कीघटना कम से कम भारत में नहीं हुई थी कि एक ही परिवार के इतने सारे सदस्यएक साथ अपने ही घर में फांसी के फंदे पर लटकते पुलिस को लगा था कि उन सबकी हत्या हुई है, क्योंकि घर के रसोईघर में अगली सुबह के बे्रकफास्ट की तैयारी शाम को कर दी गई थी। यानी यह साफ था कि उन लोगों का इरादा आत्महत्या करने का नहीं था। लेकिन पुलिस को इस आश्चर्य इस बात पर हो रहा था कि घर में सबकुछ सामान्य था। यदि हत्यारों के गिरोह होते और उतने सारे लोगों की हत्या होती, तो घर में संघर्ष के निशान अवश्य होते। घर में कुछ न कुछ टूट फूट तो जरूर ही होती। लेकिन वैसा कुछ नहीं था।

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  • जस्टिस गोगोई की पीड़ा : वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण किशोर पांडेय

    सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ जज रंजन गोगोई ने हाल के एक व्याख्यान में देश के हालात पर एक व्याख्यान दिया है जो वास्तव में आज देश की सही तस्वीर पेश करता है। जस्टिस गोगोई ने अपनी ओर से यह सुझाव भी दिया है कि हालात को सुधारने के लिए जरूरी यह है कि न्यायाधीश चुप्पी तोड़ें और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करें। इतना ही नहीं, पत्रकारों को और न्यायपालिका को स्वतंत्र रहते हुए स्वतंत्र सोच के साथ अगली पंक्ति में आकर अपनी आवाज को बुलंद करना होगा। उन्होंने व्याख्यान में जो कुछ कहा उसका अर्थ भी बिलकुल साफ है। वह यह है कि समाज के विभिन्न वर्गों को जो कुछ करना चाहिए वे नहीं कर पा रहे हैं। संभावनाएं दोनों हैं- एक तो यह कि वे सब-कुछ समझते हैं, करना भी चाहते हैं लेकिन उन्हें करने नहीं दिया जाता। और दूसरी संभावना यह है कि वे खुद ही अपने को इतना कमजोर महसूस कर रहे हैं कि करने के लिए उनके मन में दिलचस्पी बची ही नहीं है। जस्टिस गोगोई के व्याख्यान से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि समाज का प्रबुद्ध वर्ग अपने कर्तव्य पालन से चूकता रहा तो स्थितियां दिन-पर-दिन बदतर होती जाएंगी और फिर ऐसा भी हो सकता है कि स्थितियां नियंत्रण से बाहर हो जाए। भारत कैसे मजबूत हुआ और उसकी मजबूती कैसे बढ़ सकती है उस रास्ते को छोड़कर अगर यहां के लोग उन रास्तों पर चलना शुरू करें जिनसे स्थितियां और खराब होंगी तो परिणाम भी सामने है और वह परिणाम कितना भीषण होगा उसकी कल्पना भयावह ही लगती है।

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  • नीतीश कुमार मझधार में तेजस्वी ने इरादे पर फेरा पानी : वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद

    (नवभारत टाइम्स के पूर्व रेजिडेंट संपादक उपेन्द्र प्रसाद) लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारो को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से बातचीत होने वाली है। लेकिन उसके पहले नीतीश अपने आपको कमजोर पा रहे हैं। कुछ दिन पहले उनकी पार्टी के प्रवक्ता और वे खुद भी कुछ ऐसे तेवर दिखा रहे थे, मानो यदि भाजपा ने उनकी बात नहीं मानी, तो पता नहीं वह क्या कर देंगे। वे भाजपा नेताओं पर दबाव बना रहे थे और कह रहे थे कि उनके बिना बिहार में भाजपा जीत हासिल कर ही नहीं सकती, जबकि सच यह है कि 2014 में भाजपा उनके बिना चुनाव लड़ रही थी और वे भाजपा के बिना चुनाव लड़ रहे थे। तब भाजपा को 22 सीटें मिली थीं और उनकी पार्टी को सिर्फ 2 सीटें और वे दोनों भी बहुत ही मामूली मतों के अंतर से।

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  • बेमेल गठबंधन था बीजेपी और पीडीपी के बीच - कांग्रेस लीडर कपिल सिब्बल।

    बेमेल गठबंधन था बीजेपी और पीडीपी के बीच। यह गठबंधन के समय से ही कहा जा रहा था कि दोनो ही पार्टियों के विचार एक दूसरे से कोसो दूर हैं एक दक्षिण ध्रुव है तो दूसरा उत्तरी ध्रुव। पीडीपी से गठबंधन और जम्मू-कश्मीर मे सरकार बनाने के लिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबकुछ ताक पर रखने के इच्छुक थे। यहां तक कि चुनाव के दौरान उन्होंने पिता-पुत्री मोहम्मद सईद और मेहबूबा मुफ्ती के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाये, जो एक तरह से कांग्रेस पार्टी को निशाना बनाया जाता रहा।

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  • आपातकाल भारत की असली प्रेत-बाधा नहीं है : वरिष्ठ पत्रकार पंकज शर्मा।

    आपातकाल की 43वीं सालगिरह के बहाने प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी, उनकी आंख के इशारे पर अपने हाथ खड़े कर देने वाले मंत्रियों और अमित शाह की पूरी भारतीय जनता पार्टी ने इंदिरा गांधी को हिटलर घोषित कर दिया। चार साल से हिटलर से हो रही अपनी तुलना का यह प्रतिकार करते वक़्त नरेंद्र भाई को इतना भी याद नहीं रहा कि तात्कालिक परिस्थितियों के चलते जिन इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था, ज़्यादतियों की बातें सामने आने के बाद विह्वल हो कर उन्हीं इंदिरा गांधी ने आपातकाल हटाया भी था। भाजपा को आज यह भूलने की सहूलियत है कि संजय गांधी तो संजय गांधी, इंदिरा जी के दूसरे तमाम नजदीकी भी आपातकाल हटाने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन बिना किसी के दबाव में आए उन्होंने आपातकाल हटाने का ऐलान कर दिया।

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  • अमेरिका से दोस्ती किसी देश के राष्ट्रहित में कभी नहीं रही : वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह।

    विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन को अमरीका यात्रा पर जाना था . वे वहां के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री से मुलाक़ात करके आपसी संबंधों के बारे में विस्तृत विचार विमर्श करने वाली थीं लेकिन अमरीका ने अनुरोध कर दिया कि कुछ ऐसी परिस्थितियाँ हैं कि इस यात्रा को रोक देना ही ठीक रहेगा. इस बातचीत के कार्यक्रम की घोषणा पिछले साल अगस्त में की गयी थी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बात हुयी थी और तय पाया गया था कि सामरिक,सुरक्षा और सैनिक सहयोग को मज़बूत करने के लिए दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रियों की बातचीत होगी.

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  • भाजपा का पीडीपी से संबंध विच्छेद क्या कश्मीर मसले पर मोदी अगला चुनाव लड़ेंगे? - वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद।

    (नवभारत टाइम्स के पूर्व रेजिडेंट संपादक उपेन्द्र प्रसाद) भारतीय जनता पार्टी ने पीडीपी से अपना संबंध विच्छेद कर लिया और महबूबा मुफ्ती की सरकार का पतन हो गया। इस अलगाव से किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि दोनों पार्टियों का वह गठबंधन एक बेमेल और अवसरवादी गठबंधन था। कहने को तो भारतीय जनता पार्टी कह रही थी कि कश्मीर के भले के लिए उसने वह गठबंधन किया, लेकिन अब उसकी सत्ता लोलुपता जगजाहिर हो गई है और सत्ता में आने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहती है। कश्मीर में उसका वह गठबंधन भी सिर्फ और सिर्फ सत्ता के लिए ही प्रेरित था।

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  • क्या अटल जी को भूल चुकी है भाजपा? बीमार नेता पर राजनीति - वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद

    अटल बिहारी वाजपेयी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में इलाज के लिए भर्ती हैं। उनका स्वास्थ्य तो वर्षों से खराब है और घर में रहकर ही वे अपना इलाज करवा रहे थे, लेकिन अब स्थिति कुछ ज्यादा खराब हो गई है और उन्हें एम्स में भर्ती करवाना पड़ा है। श्री वाजपेयी 94 साल के हैं। इस उम्र में अनेक प्रकार की व्याधियां व्यक्ति को घेर लेती हैं। अटल के साथ भी यही हुआ है। इसलिए अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती होने में कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है, लेकिन उनके अस्पताल में भर्ती होने के बाद राजनीति भी शुरू हो गई है और इसकी शुरुआत कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कर दी है।

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  • जब जब महंगाई को गंभीरता से नहीं लिया गया तो सरकारें बदल दी गयी हैं - वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह

    जब राजनीतिक दल विपक्ष में होते हैं तो उनको चारों तरफ महंगाई ही दिखती है लेकिन सत्ता में आने के बाद जब उनके नेता सरकार बन जाते हैं तो महंगाई की बात अकादमिक तरीकों से करने लगते हैं . यह नियम अपने देश में हमेशा से ही लागू है. जब आज की सरकारी पार्टी को संसद में मुख्य विपक्षी पार्टी होने का रूतबा हासिल था तो इसके नेताओं के महंगाई को फोकस में रखकर दिए गए भाषण बहुत ही आकर्षक शब्दावली और बहुत ही सही आंकड़ों से भरपूर होते थे . लेकिन सरकार में आने के बाद वे नेता महंगाई की बात नहीं करते. उन नेताओं की कृपा से दिल्ली के जीवन को सुर्खरू बना रहे पत्रकार भी आजकल महंगाई की बात उस तरह से नहीं करते जैसे उस समय किया करते थे.

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