विचार मंच

  • जब दूरियां बढने लगी तो गलतफहमियां भी बढने लगी। फिर उन्होंने वही सुना जो मैंने नहीं कहा - कांग्रेस लीडर कपिल सिब्बल

    टाइम्स खबर timeskhabar.com कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल इन दिनों सुर्खियों में हैं। वजह उन्होंने कांग्रेस पार्टी में व्यापक बदलाव के लिये कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी को पत्र लिखा जिसमें 23 वरिष्ठ नेताओं के हस्ताक्षार हैं। इसको लेकर उनपर आरोप भी लगे कि वे बीजेपी से मिले हुए हैं जिसका उन्होंने जोरदार विरोध किया और कहा कि इतने सालों की राजनीति में मेरे एक भी बयान और कदम बता दें जो बीजेपी के समर्थन में हैं। इस पूरे प्रकरण में पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत की। बातचीत के प्रमुख अंश : कांग्रेस लीडर सिब्बल ने कहा कि 23 नेताओं के हस्ताक्षर वाले पत्र को सीडब्लूसी में नजरअंदाज किया गया। दरअसल राजनीति का संबंध कोई दिन-रात से नहीं होता बल्कि कुछ उद्देश्यों को लेकर होता है। हम कहाँ से आ रहे हैं? एक, हम मानते हैं कि कांग्रेस की विरासत और उसकी ऐतिहासिक भूमिका को संरक्षित रखने की आवश्यकता है और हमें उन मूल्यों के अनुरूप आगे बढ़ना चाहिए, जो कांग्रेसियों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गले लगाए थे। वह वैचारिक पहलू है।

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  • गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का कोई अस्तित्व नहीं। राहुल हीं कांग्रेस को मजबूत करने में सक्षम : वरिष्ठ पत्रकार राजेश कुमार

    साल 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस पार्टी का ग्राफ काफी तेजी से गिरा। इसे लेकर कांग्रेस में मंथन का दौर जारी है। और कहा जा रहा है कि गांधी परिवार से बाहर किसी को पार्टी अध्यक्ष बनाया जाना चाहिये। कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने के उद्धेश्य से पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र भी लिखा, जिसको लेकर काफी विवाद हुए। बात यहां तक हो गई कि पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले नेता बीजेपी से मिले हुए हैं। इस पर पूर्व केंद्रीय मंत्रियों गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल ने प्रतिक्रियाएं व्यक्त की और इसका खंडन किया। बाद में इसे मैनेज किया गया। अब सवाल है कि क्या गांधी परिवार कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने की स्थिति में है? क्या गांधी परिवार के बाहर से किसी को पार्टी अध्यक्ष बनाया जाना चाहिये? क्या राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिये चुनौती पेश कर सकेंगे? ऐसे कई सवाल उठाये जा रहे हैं। इस बारे में आगे बढने से पहले दो बातों पर ध्यान देना उचित होगा - 1. कांग्रेस पार्टी का कोई विधायक या सांसद या अन्य नेतागण बीजेपी या अन्य विरोधी विचार धारा वाली पार्टियों के नेताओं से मिलते हैं तो इसे नकारात्मक रूप में नहीं लिया जाना चाहिये। पार्टी के अलग अलग लीडर्स आपसी मित्र भी तो हो सकते हैं। और जो टूटने वाले होंगे उसे कब तक रोका जा सकता है? 2. आज की तिथि में कांग्रेस पार्टी को कोई बचा सकता है तो वे गांधी परिवार के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी हीं हैं। आइये जानते हैं -

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  • परिवार की गिरफ्त से बाहर नहीं निकला, तो कांग्रेस का अंत सुनिश्चित है : वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद

    कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं द्वारा लिखी गई चिट्ठी के बाद संगठन के अंदर जो प्रतिक्रिया हो रही है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए यह बहुत बड़ा अपशकुन है। जिन नेताओं ने पार्टी को मजबूत बनाने के ध्येय से पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष को पत्र लिखा, उन्हें ही पार्टी विरोधी करार दिया जा रहा है और यह काम वे लोग कर रहे हैं जो खुद मानसिक दासता से ग्रस्त होकर सोनिया, राहुल और प्रियंका के अलावा कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर किसी और को नहीं देखना चाहते। खुद सोनिया और उनके बेटे-बेटी का रवैया पत्र प्रकरण पर सकारात्मक नहीं रहा। सोनिया गांधी ने वैसे खिलाफ में जाहिरा तौर पर कुछ नहीं बोला, लेकिन चिट्ठी लिखने वालों की सराहना करके पार्टी में वैसा माहौल बनने से वह रोक तो सकती ही थीं, जैसा आज बन गया है। राहुल गांधी ने तो चिट्ठी लिखने वालों की आलोचना भी कर दी। पहले यह खबर आई थी कि उन्होंने पत्र लिखने वालों के बीजेपी से सांठगांठ करने वाला तक कह दिया, लेकिन बाद में उन्होंने इसका खंडन किया। लेकिन उन्होंने पत्र लिखे जाने के समय पर सवाल उठाकर अपनी नाराजगी तो जाहिर कर ही दी। वे कह रहे हैं कि पत्र उस समय लिखा गया, जब सोनिया अस्पताल में थीं और पार्टी नेतृत्व राजस्थान संकट का सामना करने में लगा हुआ था। पर पत्र लिखने वाले कह रहे हैं कि सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने के एक साल पूरा होने की तिथि को ध्यान में रखते हुए उन्होंने वैसा किया।

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  • कोरोना काल में बिहार चुनाव आखिर हमारे राजनेता चाहते क्या हैं? : वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद

    बिहार में चुनाव होने या न होने की अनिश्चितता के बीच भारत के निर्वाचन आयोग ने विधानसभा चुनाव के लिए नियमावली भी प्रकाशित कर दी है और मीडिया में आई खबर को यदि सही मानें, तो सितंबर के तीसरे सप्ताह में चुनाव की तिथियां भी घोषित कर दी जाएगी। यानी निर्वाचन आयोग की तरफ से चुनाव की पूरी तैयारी की जा रही है और बिहार सरकार भी वहां चुनाव चाहती है। चुनाव अपने तय समय पर होना अच्छी बात है। नवंबर महीने में वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल पूरा हो जाएगा और उसके पहले नई विधानसभा का चुनाव हो जाना संवैधानिक जिम्मेदारी है।

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  • प्रशांत भूषण को माफी नहीं मांगनी चाहिए लोकतंत्र सर्वोपरि है : उपेन्द्र प्रसाद

    प्रशांत भूषण के खिलाफ चल रहे अदालती अवमानने की कार्रवाई ने अब दिलचस्प मोड़ ले लिया है। उन्हें इस मामले में दोषी तो पहले ही करार दिया गया है और सजा 20 अगस्त को सुनाई जानी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सजा के कुछ समय के लिए टाल दिया है। उम्मीद की जा रही थी 20 अगस्त को सजा का एलान हो जाएगा और दिलचस्पी इस बात को लेकर थी कि उन्हें कितने दिनों के लिए सजा होगी। लेकिन सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार ने अदालत से यह कहकर सबको अचंभित कर दिया कि भूषण को सजा नहीं दी जाय। प्रशांत भूषण अपने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से सरकारी प्रतिष्ठान को भी सांसत में डालते रहते हैं। मोदी सरकार के खिलाफ भी उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान छेड़ रखा है। इसलिए यह आश्चर्यजनक था कि मोदी सरकार ने भी उन्हें सजा न देने की सिफारिश सुप्रीम कोर्ट से की।

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  • जिस मानसिकता के साथ नई शिक्षा नीति अपनाई गई है वह केवल कागज पर उम्मीद जगा सकता है - पू्र्व एचआरडी मिनिस्टर कपिल सिब्बल।

    एक शिक्षित व्यक्ति वह होता है जो दूसरों की भलाई में योगदान देता है और वह स्वार्थ से प्रेरित नहीं होता है। इसलिए, किसी भी शिक्षा नीति को मानवीय मूल्यों का पोषण करना चाहिए जो किसी व्यक्ति को समाज के कल्याण में योगदान देता है। इस संदर्भ में, सरकार द्धारा हाल ही में घोषित नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी NEP) के पीछे की मानसिकता क्या है। इसको जानने के लिये एक विश्लेषण ।

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  • अयोध्या भूमि पूजन के मूहुर्त का मामला यह ‘हिन्दू बनाम हिन्दू’ के लंबे विवाद का कारण बन सकता है : वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद

    अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए हो रहे भूमिपूजन को लेकर जो विवाद हो रहा है, उसे टाला जाना चाहिए था। यह एक ऐसा विवाद है, जो मंदिर के निर्माण के दौरान ही नहीं, बल्कि उसके बाद भी लोगों के दिलोदिमाग को मथता रहेगा। मुख्य विवाद है कि शंकराचार्य, ज्योतिष और अन्य मंदिर निर्माण से जुड़े अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि भूमिपूजन का समय अशुभ है। वे कह रहे हैं कि भादों के महीने में किसी नये निर्माण के लिए भूमिपूजन नहीं होते। राममंदिर एक वैष्णव मंदिर है। राम को विष्णु का अवतार माना जाता है। अनेक वैष्णवार्चाय भी इस मंदिर के लिए भूमिपूजन के समय पर आपत्ति प्रकट कर रहे हैं। उनकी आपत्ति को दरकिनार किया जाना उचित नहीं है, क्योंकि आपत्ति करने वाले अनेक लोग तो ऐसे हैं जिनका राजनीति से कुछ लेना देना नहीं और उनमें से जिनका राजनीति से लेना देना है, उनमें से ज्यादा तो आरएसएस के हिन्दुत्व ब्रांड की राजनीति का समर्थन ही करने वाले है।

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  • चीन की वजह से खुशहाल रिश्तों में दरार। रूस ने चीन के साथ एस-400 करार को निलंबित किया।यदि चीन पाक को यह हथियार दे देता तो भारत के लिये मुश्किलें हो सकती थी : वरिष्ठ पत्रकार राजेश कुमार

    विस्तारवादी मानसिकता वाला देश है चीन। भारत समेत तमाम सीमावर्ती देशों की जमीनें हड़पने की कोशिश करने वाला देश चीन अब खुद हीं अपने जाल में फंसता जा रहा है। कहा भी जाता है कि जब कोई व्यक्ति दूसरों के लिये गढ्ढा खनता है तब प्रकृति उसके लिये खाई तैयार कर देती है। यहीं होता जा रहा है कि चीन के साथ। अमेरिका से दुश्मनी करने वाला चीन ने अब अपने दो ताकतवर पड़ौसी देशों भारत और रूस से भी दुश्मनी मोल लिया है। भारत पर धोखे से हमले करने के बाद दोनो देश इन दिनों युद्ध की स्थिति में है। वहीं रूस ने भी चीन को भारी झटका दिया है।

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  • नई वैश्विक व्यवस्था : खतरनाक साजिश है एजेंडा-21 - वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण कुमार

    कुछ साल पहले एक फिल्म आने वाली थी जिसका नाम था ए ग्रे स्टेट (A Grey State)। इस फिल्म के माध्यम से आज कोरोना महामारी की आड़ में जो कुछ भी हो रहा है वह फिल्मकार ने बताने की कोशिश की थी, लेकिन दुर्भाग्य से फिल्म के रिलीज होने से पहले ही फिल्म के निर्माता-निर्देशक डेविड क्रौली की हत्या हो गई।

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  • Bihar-Election बिहार विधानसभा चुनाव इसे टालने में ही समझदारी है : वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद

    बिहार विधानसभा ( Bihar Vidhansabha) का वर्तमान कार्यकाल समाप्ति की ओर है और नवंबर महीने तक नई विधानसभा के लिए चुनाव हो जाना चाहिए। चुनाव की वहां सरगर्मी भी शुरू है। लेकिन इसी सरगर्मी के बीच वहां कोरोना के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं। यदि दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से उनकी तुलना करें, तो वहां अभी भी कोरोना के मामले कम दिख रहे हैं। जाहिर है, कोरोना मामले अभी पीक की और बढ़ ही रहे हैं। प्रतिदिन कोरोना संक्रमण के मामले में 19 जुलाई को तो इसने दिल्ली को भी पीछे छोड़ दिया है। पटना में राजनिवास, मुख्यमंत्री निवास, सचिवालय, भाजपा कार्यालय जैसी जगहों में भी कोरोना पोजिटिव पाए गए हैं। जाहिर है, वहां चुनाव के लिए सही माहौल नहीं है। अभी तो वहां कोविड का प्रकोप कम है। समय के साथ यह बढ़ता जा रहा है। स्वास्थ्य का वहां ढांचा बहुत कमजोर है। वह इतना कमजोर है कि हम उसे लगभग अनुपस्थित मान सकते हैं। इसके कारण जो बीमार हैं, उनका सही इलाज नहीं हो पा रहा है। एक मामला तो ऐसा आया कि जो डॉक्टर कोरोना का इलाज कर रहा था और इलाज करते हुए जब खुद संक्रमित हो गया, तो उसको किसी अस्पताल में भर्ती होने के लिए बेड ही नहीं मिल रहा था। चर्चा है कि कोविड अस्पतालों में राजनीतिज्ञ और उनके रिश्तेदार भरे हुए हैं और खुद बीमार डॉक्टरों के लिए बेड का अभाव हो गया है। यह भी खबर आई है कि अनेक अस्पताल ही वहां बंद कर दिए गए हैं, क्योंकि अस्पताल में जरूरी स्टाफ नहीं हैं।

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