समय रहते काला बाजार को रोके अन्यथा स्थिति विस्फोटक हो सकती है।

समय रहते काला बाजार को रोके अन्यथा स्थिति विस्फोटक हो सकती है।

राजेश कुमार ( वरिष्ठ पत्रकार, स्टार न्यूज)

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधार के क्षेत्र में बहुत काम किये हैं लेकिन वे अभी तक बुनियादी स्तर पर इसका हल नहीं निकाल सके कि उत्पादन करने वाले किसानों की समस्याओं को कैसे सुलझाया जाये। इतना ही नहीं उपभोक्ताओं को भी मंहगाई की मार से कैसे बचाया जाये इसका हल नहीं निकाल पाई है सरकार। लेकिन इसके लिये सिर्फ प्रधानमंत्री को दोषी मानना गलत होगा। मंहगाई और काला बाजार के लिये केंद्र और राज्य सराकरें दोनो दोषी है।

केंद्र सरकार को यह सोचना होगा कि सिर्फ लाइसेंस राज को कम करने से कोई विशेष सुधार नहीं होने वाला है। इसके साथ साथ सरकार जब तक काला बाजार पर रोक लगाने में सक्षम नहीं होगी तबतक वे महंगाई पर काबू नहीं पा सकेंगी। सरकार को सोचना होगा कि पैदावर अधिक होने के बावजूद देश का किसान गरीबी से क्यों जूझ रहा है? करोड़ो लोग क्यों भूखे हैं? पैदावर अधिक होने के बावजूद मंहगाई क्यों बढ रही है?

भारत में अन्नाज की पैदावर लगातार बढती जा रही है। इसके बावजूद फसल उपजाने वाले अधिकांश किसान परेशान हैं। कई किसान आर्थिक कर्जे में डूब चुके हैं। उनके पास भविष्य की खेती के लिये धन का अभाव है। ऐसे में समझ सकते हैं खेतीहर मजदूरों की क्या हालत होगी? उन्हें ठीक तरह से एक जून की रोटी तक नसीब नही हो पाती है।

दूसरी ओर उपभोक्ताओं की भी हालत खस्ती है। लगातार मंहगाई बढती जा रही है। उपभोक्ता परेशान हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें और क्या न करें। ऐेसे में गौर करने वाली बात यह है कि किसान फसल की पैदावर भी अधिक से अधिक कर रहे हैं। बाजार मे खपत भी अधिक है और वस्तुओं की कीमतें भी लगातार बढती जा रही है। पैदावर अधिक होने के बावजूद इसका लाभ न तो किसानों को मिल रहा है और न ही उपभोक्ताओं को। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर पैसे कहां जा रहा है?

बिचोलिये के कारण मंहगाई लेकिन सरकार लाचार है।

आईये जानते हैं कुछ उदाहरण से कि काला बाजार कैसे होता है फसलों का। उदारहण के तौर पर प्याज को ही लिजिये। मान लिजिये किसानों ने साल 2012 में प्याज का उत्पादन बीते साल के अपेक्षा 1000 टन अधिक कर लिया। किसान खुश हुए कि चलो इस बार थोड़ी आमदनी अधिक होगी। उपभोक्ताओं को भी लगता है कि इस बार प्याज का उत्पादन अधिक हुआ है तो कुछ सस्ता मिलेगा। लेकिन होता है सब कुछ ठीक उल्टा। इसमें खेल करते हैं काला बाजार को चलाने वाले दलाल किस्म के व्यापारी।

दलाल किस्म के व्यापारी किसानों से संपंर्क करते हैं प्याज खरीदने के लिये। और पहले के अपेक्षा कम भाव देते हैं किसानों को। मान लिजिये पिछले साल दलाल किस्म के व्यापारियों ने पांच रूपये प्रति किलो प्जाज खरीदा था तो वे इस साल चार रूपये किलों बेचने के लिये किसान पर दबाव बनाते हैं। उनका तर्क होता है कि इस साल प्याज का उत्पादन बहुत अधिक हुआ है लिहाजा बाजार में प्याज भरे पड़े हैं। किसान भी सोचता है कि चलो यदि यह भी पैसा नहीं मिलेगा तो क्या करेंगे? किसान दुखी मन के साथ अधिक मेहनत कर उत्पादन करने के बावजूद कम भाव में फसल बेचने को मजबूर हो जाता है।

दलाल एक तरफ किसान को झांसा देकर सस्ते में फसल खरीद कर अपने गोदाम में प्याज भर लेता है। और बाजार में प्याज की किल्लत कर देता है। मान लिजिये बाजार को 300 टन प्याज की जरूरत है और दलाल के पास 400 टन प्याज है। ऐसे में दलाल बाजार को डेढ सौ टन ही प्याज सप्लाई करता है। नतीजा वस्तुओं की कमी और मांग अधिक होने से मंहगाई आसमान छुने लगता है। जब दलाल किस्म के लोग करोड़ो कमा लेते हैं। चारो ओर हंगामा होने लगता है। दलाल को लगता है कि अब कुछ दिन बाद उनके गोदाम में जमा फसल खराब हो जायेगा तो वे बाजार में सप्लाई कर देते हैं। इसमें भी वे काफी कमाते हैं।

ऐसा खेल हर फसलों के साथ होता है। यानी किसान और उपभोक्ताओें को कोई लाभ नहीं होता और सारा लाभ दलाल किस्म के व्यापारी और उनके हमदर्द नेता और अधिकारियों को होता है।

इसके अलावा फसल को संभाल कर रखने की नीति नहीं बनाई जा सकी है। इसके लिये जरूरी है कि राजनीति दलगत से उपर उठकर केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर ठोस उपाय करने होंगे।

बहरहाल गलती किसी की भी लेकिन यदि किसी समस्या का समाधान न हो तो सरकार को ही दोषी माना जायेगा। यदि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले दिनों में हमारे नेताओं को गंभीर समस्याओं से सामना करना पड सकता है।

अभी हाल हीं में केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में किसानो ने काले झंडे दिखाये। यह मामला सिर्फ शरद पवार का नहीं है। इसमें पक्ष और विपक्ष दोनो को ही मिलकर सोचना होगा। हर पार्टी कही न कही सरकार में है और जनता उसे अभी काले झंडे दिखा रही है। यह आने वाले विकराल रूप के संकेत हैं इसलिये कोई बात हाथ से न निकल जाये इसलिये मिलकर सोचना होगा।