अनुच्छेद 370 सुर्खियों में।

अनुच्छेद 370 सुर्खियों में।

नई दिल्ली।  नरेन्द्र मोदी सरकार द्धारा सत्ता संभालने के पहले ही दिन विवादों की शुरुआत हो गई है। एक ओर जहां स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्री बनाने को लेकर विरोध शुरू हो गया है, वहीं पीएमओ में राज्य मंत्री जितेन्द्र सिंह ने धारा-370 पर बयान देकर नए विवाद को जन्म दे दिया। इसके जवाब में जम्मू कश्मीर के मुख्‍यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी काफी तीखा ट्‍वीट किया। उमर के ट्वीट का संघ ने करारा जवाब दिया है।

उमर ने सिंह के बयान के जवाब में कहा है कि धारा-370 ही है जो संवैधानिक रूप में जम्मू कश्मीर को भारत से जोड़ती है। उन्होंने कहा, 'मेरे शब्दों को ध्यान में रखिए और मेरे ट्‍वीट को भी सेव कर लीजिए। या तो धारा 370 रहेगी या फिर जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं रहेगा।' उन्होंने इस बात पर आश्चर्य जताया कि इस मामले में केन्द्र सरकार की ओर से काफी जल्दी शुरुआत हुई है। उमर ने मंत्री के बयान को काफी गैर जिम्मेदाराना बताया है।

जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के ट्वीट के जवाब में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राम माधव ने कहा है कि अनुच्छेद-370 रहे न रहे, जम्मू-कश्मीर हमेशा से भारत का अभिन्न अंग रहा है और रहेगा। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेन्द्र सिंह ने  पदभार संभालने के बाद कहा कि उनकी सरकार जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद-370 के बारे में चर्चा कराने तथा इसे खत्म करने को तैयार है।

सिंह ने कहा कि हमने अनुच्छेद-370 पर सभी पक्षों से बातचीत करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। हम इस पर चर्चा के लिए तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा इस चुनाव में जम्मू कश्मीर की आधी से अधिक सीट जीती है। इसलिए क्या आप इसे अनुच्छेद-370 पर भाजपा के रूख की पुष्टि नहीं मानेंगे?

गौरतलब है कि भाजपा ने लोकसभा चुनाव में अपने घोषणा पत्र में अनुच्छेद-370 के बारे में कहा था कि भाजपा संविधान के इस प्रावधान पर अपना रुख दोहराती है। वह सभी पक्षों के साथ बातचीत करेगी तथा इस अनुच्छेद पर चर्चा कराने के बारे में संकल्पित है। हालांकि पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में राम मंदिर और धारा-370 जैसे मुद्दों को पिछले पन्नों पर डाला था, लेकिन पिछले पन्ने का यह मुद्दा सबसे पहले बाहर आ गया है।

बहरहाल आईये जानते हैं कि अनुच्छेद 370 क्या है? 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 एक 'अस्‍थायी प्रबंध' के जरिए जम्मू और कश्मीर को एक विशेष स्वायत्ता वाला राज्य का दर्जा देता है। अनुच्छेद 370 का खाका 1947 में शेख अब्दुल्ला ने तैयार किया था, जिन्हें तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था।

तब शेख अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 को लेकर यह दलील दी थी कि संविधान में इसका प्रबंध अस्‍थायी रूप में ना किया जाए। उन्होंने राज्य के लिए लोहे की तरह मजबूत स्वायत्ता की मांग की थी, जिसे केंद्र ने ठुकरा दिया था। 1965 तक जम्मू और कश्मीर में राज्यपाल की जगह सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री हुआ करता था।

संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू कराने के लिए केंद्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिए।

सी विशेष दर्जें के कारण जम्मू-कश्मीर पर संविधान का अनुच्छेद 356 लागू नहीं होता। राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है।

भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता। (साभार सत्ता विमर्श व नव भारत टाइम्स)