वैश्विक तनाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी रूस पहुंचे। अमेरिका और रूस के बीच संतुलन कायम रखने की चुनौती।

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वैश्विक तनाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी रूस पहुंचे। अमेरिका और रूस के बीच संतुलन कायम रखने की चुनौती।

(राजेश कुमार, टाइम्स खबर) देश में यानी घर के अंदर घरेलू झगडे कितने भी हो लेकिन विश्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम स्थापित हो चुका है। इतने अनुभव प्राप्त कर चुके हैं कि इसका लाभ देश को सदैव मिलता रहेगा। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज रूस के सोचि पहुंच गये हैं। उनकी मुलाकात रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से होगा। राष्ट्रपति पुतिन बीते महीने एक बार फिर रूस के राष्ट्रपति चुने गये हैं छह सालों के लिये। राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रूस आने का न्यौता दिया जिसे प्रधानमंत्री ने स्वीकार कर लिया। 

दोनो देशों के प्रमुखों की यह मुलाकात अनौपचारिक होगी। यानी पहले से कोई ऐजेंडा तय नहीं है। ऐसा ही दौरा प्रधानमंत्री मोदी चीन का कर चुके है। 30 अप्रैल को वुहान शहर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री मोदी के बीच वार्तालाप हुई आनौपचारिक तौर पर। चीन और रूस का दौरा अनौचारिक भले हीं हो लेकिन इसका खासा महत्व है विश्व कुटनीति और सामरिक दुनिया में। इस मह्तव को प्रधानमंत्री मोदी के इस ट्वीट से समझा जा सकता है। उन्होंने बीते रविवार यानी रूस जाने से पहले उन्होंने ट्वीट किया कि हमें पूरा भरोसा है कि राष्ट्रपति पुतिन से बातचीत के बाद भारत और रूस की खास रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होगी।  

 

प्रधानमंत्री मोदी के लिये चुनौती : 

 

1. एक बार फिर रूस और अमेरिका के बीच कोल्डवार शुरू हो गया है। आज की तारीख में भारत के लिये दोनो महत्वपूर्ण होगा रूस और अमेरिका। प्रधानमंत्री के लिये जरूरी है कि दोनो देशों के बीच तालमेल बनाये रखें। लेकिन जब एक को चुनने की बारी आयेगी तब प्रधानमंत्री क्या करेंगे? जानकारों का कहना है कि ऐसे स्थिति में भारत को रूस के साथ ही जाना चाहिये। क्योंकि रूस हमेशा ही भारत के साथ खड़ा रहा है। चाहे युद्ध का मसला हो या जम्मू कश्मीर का या हथियार बनाने का। एक तो भारत की सामरिक ताकत रूसी हथियार है वो भी तकनीकी के साथ। इतनी मदद अमेरिका क्या पूरा पश्चिमी देश भी नहीं कर सकता। 

 

2. अमेरिका ने पिछले साल काउंटरिंग-अमरीकाज-एडवर्सरिज थ्रू सेक्शन्स एक्ट (CAATSA)पारित किया था पिछले साल। इसके तहत रूस, उत्तरी कोरिया और ईरान पर पाबंदी लगाई थी। और इस पाबंदी का सीधा असरा भारत-रूस के रक्षा सौदों पर पड़ेगा। भारत कभी नहीं चाहेगा कि रूस-भारत के रक्षा संबंधों पर कोई असर पड़े किसी अन्य तीसरे देश के कारण। वहीं अमेरिका में भी इस बात लेकर बहस  चल पड़ी है कि इस एक्ट के तहत भारत-रूस रक्षा सौदो को प्रभावित करने के लिये भारत पर दबाव डाला गया तो इससे सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका को भी नुकसान उठाना होगा। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस मामले को सुलझाने के लिये कोशिशें शुरू कर दी गई हैं।  

 

3. अमेरिकी प्रतिबंध के बाद ईरान से भी पेट्रोलियम आयात करना भारत के लिये काफी कठिन हो जायेगा। क्या भारत इसके लिये तैयार है। क्योंकि भारत में ईधन की पूर्ति बड़े पैमान पर ईरान से किया जाता है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिये एक तरह से विदेश नीति पर परीक्षा की घड़ी है। क्या भारत अमेरिकी दबाव में रूस के साथ सामरिक रिश्ते को खत्म करेगा या रूस के दबाव में अमेरिका से दोस्ती। भारत ने जैसे जैसे अमेरिका से रिश्ते मजबूत करने शुरू किये है वैसे वैसे पाकिस्तान रूस के नजदीक आने की कोशिशें शुरू कर दी है।  दोनो देशों के बीच रक्षा सौदों की बात होने लगी है। पाकिस्तान का रूस के नजदीक आना देश के लिये चिंता का विषय हो सकता है।

यह सर्वविदित है कि भारत और रूस के बीच ऐतिहासिक दोस्ती है। रूस ने अपने सामरिक व्यापार को बढाने के लिये भारत को न सिर्फ आधुनिक हथियार दिये बल्कि तकनीक भी दी। वो भी पश्चिमी देशों के अपेक्षा काफी कम दामों में। पश्चिमी देश कभी भी भारत को तकनीक देने के लिये तैयार नहीं हुआ। इस व्यापार के अलावा यदि 1971 के युद्ध में भारत के पक्ष में रूस नहीं आता तो अमेरिका और ब्रिटेन समेत पूरा नाटो देश पाकिस्तान से अलग बांग्लादेश बनने नहीं देता और दूसरा कश्मीर को भी संभवत अलग कर देता। लेकिन रूस सीधे अमेरिका को चुनौती दी और उसके खिलाफ युद्ध के मैदान में सातवां बेड़ा उतार दिया। इतना ही नहीं रूस ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के पक्ष मे खड़ा रहा। और अमेरिका-ब्रिटेन-पाकिस्तान की हर रणऩीति का मुंहतोड़ जवाब दिया और वीटो का इस्तेमाल करता रहा। 

 

लेकिन अब रूस भी अपनी रणनीति मे बदलाव करता दिख रहा है। एक ओर जहां अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते खराब हुए, भारत और अमेरिका के रिश्ते मजबूत हुए वहीं रूस और पाकिस्तान भी नजदीक आते दिख रहे हैं। रूस और पाकिस्तान का नजदीक आने हमारे लिये चिंता का विषय है। बीबीसी रिपोर्ट के अनुसार बीते साल दिसंबर महीने में छह देशों के स्पीकरों का सम्मेलन हुआ था पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में। इसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, ईरान और तुर्की के अलावा रूस के स्पीकर भी शामिल हुए थे। इस सम्मेलन में कश्मीर पर पाकिस्तान द्धारा एक प्रस्ताव पारित किया गया। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि वैश्विक और क्षेत्रीय शांति के लिए जम्मू-कश्मीर का भारत और पाकिस्तान के बीच संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के मुताबिक़ शांति ज़रूरी है। पाकिस्तान के इस प्रस्ताव को रूस समेत सभी देशों ने सहमति से पास किया था।

इतना ही नहीं बीबीसी ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि बीते साल यानी 2017 में ही रूस के विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव नई दिल्ली आये थे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि भारत को चीन के वन-बेल्ट वन-रोड परियोजना में शामिल होना चाहिए। भारत को इस व्यापक परियोजना में शामिल होने के लिए कोई रास्ता निकालना चाहिए। चीन और पाकिस्तान के बीच चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर के पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से गुजरने पर भारत की तरफ़ से संप्रभुता के गंभीर सवाल उठाए जाने पर रूसी विदेश मंत्री ने कहा था कि कुछ ख़ास आपत्तियों के कारण राजनीतिक मतभेदों को सुलझाने के लिए शर्तें नहीं रखनी चाहिए। इतना ही नहीं रूसी विदेश मंत्री ने अमरीका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत की साझेदारी पर भी नाख़ुशी जताई थी। उन्होंने कहा था कि एशिया-प्रशांत में सुरक्षा की जो टिकाऊ साझेदारियां हैं उसकी तुलना में इन साझेदारियों से कुछ हासिल नहीं होगा।

बहरहाल कुल मिलाकर भारत के प्रधानमंत्री को अपनी विदेश नीति की कुशलता दिखानी होगी क्योंकि हम ऐसे मुहाने पर खड़े हैं जहां एक भी गलती हमें नुकसान दे सकता है। हमारी दिक्कत यह है कि चीन बार बार भारत के लिये दिक्कतें पैदा करता है। कभी भारत की जमीन को अपना बताकर तो कभी भारत के दुश्मन देश पाकिस्तान को खुले आम मदद देकर। रूस को लगता है कि अमेरिका नेतृत्व वाली दुनिया को यदि चुनौती देना है तो उसके लिये उसके साथ चीन भी रहे। 

भारत और रूस के बीच सीरिया, अफगानिस्तान में आतंकवाद के अलावा बलूचिस्तान की स्थिति पर भी चर्चा संभव है। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि भारत के लिये दोनो देशों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। नेताओं के व्यक्तिगत रिश्ते को छोड दें तो बतौर देश रूस अभी तक हमेशा भारत के साथ रहा है। हालांकि उम्मीद यही है कि भारत और रूस के बीच क्या बातचीत होगी यह सबकुछ कयास है। जब बातचीत होगी तब भी पूरी बात राष्ट्रहीत में सामने नहीं आयेगी। ऐसा पहले भी हो चुका है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की दूरदृष्टि की वजह से, 1971 के युद्ध से पहले भारत और रूस के बीच समझौता हो चुका था कि यदि किसी एक देश भी हमला होता है तो दोनो देश पर हमला माना जायेगा। यह बात अमेरिका तक को पता नहीं थी इसलिये 1971 के युद्ध एक ओर जहां भारत और रूस साथ थे वहीं दूसरी ओर अमेरिका-ब्रिटेन-फ्रांस समेत पूरी दुनिया एक साथ थी लेकिन जीत अपने देश की हुई।