कर्नाटक विस चुनाव : लिंगायत का राजनीतिक महत्व। अलग धर्म की मांग। कांग्रेस ने समर्थन दिया। बीजेपी का विरोध। जानते हैं कौन हैं लिंगायत।

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कर्नाटक विस चुनाव : लिंगायत का राजनीतिक महत्व। अलग धर्म की मांग। कांग्रेस ने समर्थन दिया। बीजेपी का विरोध। जानते हैं कौन हैं लिंगायत।

(राजेश कुमार, टाइम्स ख़बर) कर्नाटक में लिंगायत समुदाय का विशेष महत्व है। इनकी संख्या भी अच्छी खासी है। लगभग 17 प्रतिशत, इसलिये इनका चुनावी महत्व भी ज्यादा है। इस समुदाय का मानना है कि वे लोग हिन्दू (सनातन धर्म) नहीं है।पूजा पाठ करने का तरीका भी बिल्कुल अलग है। वे निराकार शिव की आराधना करते हैं। कोई मूर्ति पूजा नहीं होती। और न ही वे मंदिर जाते हैं। इसलिये लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा दिया जाये। ये मांग काफी अरसे से हो रही है। इसको लेकर राज्य में हिंसा भी हो चुकी है। इस बीच कर्नाटक विधान सभा चुनाव से पहले कर्नाटक सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता देने की सिफारिश कर दी। बीजेपी ने इसका विरोध किया। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लिंगायत समुदाय के धर्म-गुरूओं से मुलाकात की लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। लिंगायत समुदाय ने कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। लिंगायत में भी मतभेद है। एक अलग धड़ा है वीरशैवा पंथ जो अपने आपको हिंदू धर्म से अलग नहीं मानता।   

- विधान सभा चुनाव से पहले कांग्रेस की सरकार ने लिंगायत समुदाय की काफी पुरानी मांगों को पूरा करते हुए लिंगायत को अलग धर्म के रूप में मान्यता देने की सिफारिश की।

- लिंगायत अपने आपको हिंदू से अलग मानते हैं। वे मूर्तिपूजा नहीं करते। शिव को निराकार मानते हैं। मंदिर नहीं जाते।

- लिंगायतो में ही एक अलग पंथ है वीरेशैवा। यह अपने को हिंदू से अलग नहीं मानते। शिवपूजा भी करते हैं। इतना ही नहीं गले में  लिंग धारण भी करते हैं।

लिंगायत पंथ के बारे में जानने के लिये इतिहास को टटोलना जरूरी है। वीरेशैवा पंथ की शुरूआत जगतगुरू रेनुकाचार्य ने की थी। बाद में इनके अनुयायी बस्वाचार्य ने सुधार करते हुए एक अलग ही पंथ की स्थापना की जो निराकार शिव पर विश्वास करते हैं। आज इनके अनुयायी को लिंगायत कहा जाता है। आइये जानते हैं इसे सिलसिलेवार तरीके से - 

 - वीरेशैवा पंथ काफी प्राचीन है। इसकी शुरूआत जगत गुरू रेनुकाचार्य ने की थी। आदि शंकराचार्य की तरह इन्होंने भी पांच पीठों की स्थापना की। इनमें से चिकमंगलूर का रंभापूरी मठ सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।   

- इस पंथ के संस्थापक जगतगुरू रेनुकाचार्य थे। इनका उदय आंध्र प्रदेश में हुआ।

- वीरशैवा वैदिक धर्मों में से एक है। मूर्ति पूजा भी करते हैं। लिंग धारण भी करते हैं।

- वीरशैवा पंथ को मानने वाले लोग जनेऊ धारण करते हैं। 

- 12 वीं शताब्दी में जगतगुरू बस्वाचार्य (बासवन्ना) का उदय हुआ। वे जगतगुरू रेनुकाचार्य के अनुयायी थे।

- बस्वाचार्य ने ही सनातन धर्म से अलग एक पंथ की स्थापना की जो निराकार शिव पर विश्वास करते हैं।

- इनके लिये काम ही पूजा है।

- जाति और लिंग भेद के खिलाफ कार्य शुरू हुआ। बस्वाचार्य ने वैदिक रीति रिवार्ज को खारिज एक अलग मार्ग अपनाया। 

- जाति-लिंग भेद को समाप्त करना। इस वजह से सभी जाति के लोग काफी प्रभावित हुए बस्वाचार्य से। लोग लिंगायत धर्म अपनाने  लगे। इनमें कामकाज को लेकर कोई मतभेद नहीं था।

- बताया जाता है कि लिंगातय का कर्म और धर्म निराकार शिव की उपासना करना और आडंबर के खिलाफ काम करना है। 

- लिंगायत जनेऊ धारण नहीं करते। 

 

वीरशैवा पंथ और लिंगायत - आईये जानते हैं कि दोनो के बीच क्या अंतर है?

-वीरशैवा पंथ जहां जनेऊ धारण, शिव की मूर्ति पूजा करते हैं वहीं लिंगायत जनेऊ धारण नहीं करते और न ही मूर्त पूजा करते। वे निराकार शिव की अराधना करते हैं। 

- वीरशैवा वेद और पुरानों में विश्वास करते हैं लेकिन लिंगायत जगतगुरू बस्वाचार्य के वचनों का अनुसरण करते हैं। वस्वाचार्य का वचन संस्कृत की वजाय कन्नड़ में है। 

 

लिंगायत और इनका राजनीतिक महत्व :  

- साल 2011 की जनगणना के अनुसार लिंगायत समुदाय की संख्या लगभग 17 प्रतिशत है। इनमें से तीन-चार प्रतिशत वीरशैवा पंथ की है। 

- कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत समुदाय की बड़ी भूमिका होती है। 

- कर्नाटक में विधान सभा की कुल सीटें 224 हैं। इनमें से लगभग 100 सीटें ऐसी हैं जहां लिंगायत समुदाय का व्यापक प्रभाव है। 

- बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार येदुरप्पा लिंगायत समुदाय से हैं। एक बार इनके नेतृत्व में कर्नाटक में बीजेपी की सरकार बन चुकी है। 

- येदुरप्पा के बगावत के बाद बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा। 

- बीजेपी ने येदुरप्पा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार फिर बनाया है। बावजूद लिंगायत समुदाय ने कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान किया है।

- दरअसल कांग्रेस सरकार ने लिंगायत के वर्षों की मांग को पूरा करते हुए अलग धर्म देने की मान्यता देने की सिफारिश कर दी है।

- लिंगायत के अलग धर्म मान्यता देने का जहां कांग्रेस पार्टी ने समर्थन किया वहीं बीजेपी ने इसका विरोध किया। लिंगायत धार्मिक गुरूओं से बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने मुलाकात की लेकिन बात नहीं बनी।

 बहरहाल, कांग्रेस लीडर व कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने लिंगायत समुदाय को बतौर अलग धर्म देने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेज दिया है। केंद्र में बीजेपी की सरकार है। और बीजेपी ने इस पर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है। बीजेपी लिंगायत को हिन्दू धर्म से अलग नहीं मानती। जबकि लिंगायत जगतगुरू अपने को अलग मानते हैं। ऐसे में इसका प्रभाव पड़ना तय है।